Geography Optional 2023 Paper I

आर्थिक भू-विज्ञान के पर्यावरणीय प्रभाव क्या हैं ? चर्चा कीजिये । What are the environmental implications of economic geology? Discuss.

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आर्थिक भू-विज्ञान (Economic Geology) भू-विज्ञान की वह शाखा है जो पृथ्वी की पपड़ी में खनिजों, धातुओं, जीवाश्म ईंधन और भूजल जैसे आर्थिक रूप से मूल्यवान संसाधनों की खोज, निष्कर्षण और प्रबंधन से संबंधित है। जबकि यह मानव समाज के लिए आवश्यक कच्चे माल और ऊर्जा प्रदान करता है, इसकी गतिविधियों के महत्वपूर्ण और अक्सर नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभाव होते हैं।

आर्थिक भू-विज्ञान के प्रमुख पर्यावरणीय प्रभाव:

  1. भूमि उपयोग और आवास विनाश (Land Use and Habitat Destruction):

    • खनन: खुले गड्ढे वाले खनन (open-pit mining) और स्ट्रिप खनन (strip mining) के लिए बड़े क्षेत्रों को साफ करना पड़ता है, जिससे वनों की कटाई होती है, कृषि भूमि नष्ट होती है और वन्यजीवों के आवास नष्ट हो जाते हैं। यह जैव विविधता के नुकसान का कारण बनता है।
    • बुनियादी ढाँचा: खनन और तेल/गैस निष्कर्षण के लिए सड़कों, पाइपलाइनों, प्रसंस्करण संयंत्रों और अपशिष्ट निपटान स्थलों का निर्माण भी बड़े पैमाने पर भूमि को प्रभावित करता है।
  2. जल प्रदूषण (Water Pollution):

    • अम्लीय खान जल निकासी (Acid Mine Drainage - AMD): सल्फाइड खनिजों के ऑक्सीकरण से सल्फ्यूरिक एसिड बनता है, जो भारी धातुओं (जैसे लोहा, तांबा, जस्ता, कैडमियम) को घोलकर नदियों और भूजल में छोड़ देता है। यह जलीय जीवन के लिए अत्यधिक विषाक्त होता है और पीने के पानी को दूषित करता है।
    • रासायनिक रिसाव: खनन और प्रसंस्करण में उपयोग किए जाने वाले रसायन (जैसे साइनाइड, पारा) मिट्टी और जल निकायों में रिस सकते हैं, जिससे गंभीर प्रदूषण होता है।
    • तलछट का जमाव (Sedimentation): खनन गतिविधियों से मिट्टी का कटाव बढ़ता है, जिससे नदियों और झीलों में तलछट जमा हो जाती है, जो जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचाती है।
    • भूजल का ह्रास: खनन के लिए भूजल को पंप करने से जल स्तर गिर सकता है, जिससे आसपास के क्षेत्रों में पानी की कमी हो सकती है।
  3. वायु प्रदूषण (Air Pollution):

    • धूल और कण पदार्थ: खनन और अयस्क प्रसंस्करण से धूल और महीन कण हवा में छोड़े जाते हैं, जिससे श्वसन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं और वनस्पति को नुकसान पहुँच सकता है।
    • गैस उत्सर्जन: जीवाश्म ईंधन के निष्कर्षण और प्रसंस्करण से मीथेन (एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस), सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी गैसें निकलती हैं, जो अम्लीय वर्षा और जलवायु परिवर्तन में योगदान करती हैं।
  4. मिट्टी का क्षरण और संदूषण (Soil Degradation and Contamination):

    • कटाव: खनन से मिट्टी की ऊपरी परत हट जाती है, जिससे मिट्टी का कटाव बढ़ जाता है और भूमि की उर्वरता कम हो जाती है।
    • भारी धातु संदूषण: खनन अपशिष्ट (टेलिंग) में अक्सर भारी धातुएँ होती हैं जो मिट्टी में मिल सकती हैं, जिससे यह कृषि के लिए अनुपयुक्त हो जाती है।
  5. अपशिष्ट उत्पादन (Waste Generation):

    • टेलिंग (Tailings): अयस्क से मूल्यवान खनिजों को निकालने के बाद बचा हुआ महीन दानेदार अपशिष्ट बड़ी मात्रा में उत्पन्न होता है और इसे अक्सर बड़े तालाबों में जमा किया जाता है। ये टेलिंग विषाक्त हो सकते हैं और बांध टूटने का खतरा पैदा कर सकते हैं।
    • ओवरबर्डन (Overburden): खनन के दौरान हटाई गई मिट्टी और चट्टान की ऊपरी परत को भी बड़े ढेर के रूप में जमा किया जाता है, जो परिदृश्य को बदल देता है और कटाव का स्रोत बन सकता है।
  6. जलवायु परिवर्तन (Climate Change):

    • कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन का निष्कर्षण और दहन ग्रीनहाउस गैसों (मुख्य रूप से CO2 और मीथेन) का सबसे बड़ा स्रोत है, जो वैश्विक जलवायु परिवर्तन में योगदान देता है।
  7. भूवैज्ञानिक खतरे (Geological Hazards):

    • खनन से भूस्खलन, सिंकहोल और भूकंपीय गतिविधि (विशेषकर गहरे कुओं में अपशिष्ट जल इंजेक्शन से) का खतरा बढ़ सकता है।

इन प्रभावों को कम करने के लिए, आर्थिक भू-विज्ञान में सतत खनन प्रथाओं, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, भूमि पुनर्वास, अपशिष्ट प्रबंधन और प्रदूषण नियंत्रण प्रौद्योगिकियों को एकीकृत करना महत्वपूर्ण है।