Public Administration Optional 2025 Paper II

विषयों के विभाजन के बावजूद, केन्द्रीय सरकार राज्य एवं समवर्ती सूची के विषयों पर भी अपना योगदान देती है। राजकोषीय संघवाद के संदर्भ में इसके लाभ और हानि पर चर्चा कीजिए। Despite the division of subjects, the Union Government contributes towards subjects in the State and Concurrent Lists. Discuss its pros and cons in the light of fiscal federalism.

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भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची संघ, राज्य और समवर्ती सूचियों के माध्यम से विधायी शक्तियों का स्पष्ट विभाजन करती है। हालांकि, राजकोषीय संघवाद के संदर्भ में, केंद्र सरकार राज्य और समवर्ती सूची के विषयों पर भी महत्वपूर्ण योगदान देती है। यह योगदान मुख्य रूप से केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं (Centrally Sponsored Schemes - CSS), अनुदान (Grants-in-Aid) और अन्य वित्तीय हस्तांतरणों के माध्यम से होता है। इसके अपने लाभ और हानियाँ हैं।

केंद्र के योगदान के लाभ (Pros):

  1. राष्ट्रीय एकरूपता और न्यूनतम मानक: केंद्र सरकार के हस्तक्षेप से स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पूरे देश में न्यूनतम मानक और एकरूपता सुनिश्चित की जा सकती है। यह क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने में मदद करता है।
  2. संसाधन जुटाना: केंद्र सरकार के पास राज्यों की तुलना में अधिक राजस्व जुटाने की क्षमता होती है (जैसे आयकर, कॉर्पोरेट कर)। यह अतिरिक्त संसाधन उन क्षेत्रों में लगाए जा सकते हैं जहाँ राज्यों के पास पर्याप्त वित्तीय क्षमता नहीं होती।
  3. विशेषज्ञता और योजना: केंद्र सरकार के पास विशेषज्ञता और योजना बनाने की बेहतर क्षमता होती है, जिसका लाभ राज्यों को मिलता है, खासकर जटिल परियोजनाओं में।
  4. अंतर-राज्यीय असमानताओं को कम करना: केंद्र सरकार पिछड़े राज्यों या विशेष जरूरतों वाले क्षेत्रों को लक्षित अनुदान और योजनाएं प्रदान करके क्षेत्रीय असंतुलन को दूर कर सकती है।
  5. मैक्रो-आर्थिक स्थिरता: केंद्र का हस्तक्षेप राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों के समन्वय में मदद करता है, जिससे समग्र मैक्रो-आर्थिक स्थिरता बनी रहती है।

केंद्र के योगदान की हानियाँ (Cons):

  1. राज्य की स्वायत्तता का क्षरण: केंद्रीय प्रायोजित योजनाएं अक्सर राज्यों पर विशिष्ट शर्तों और दिशानिर्देशों के साथ आती हैं, जिससे राज्यों की अपनी प्राथमिकताओं और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार खर्च करने की स्वायत्तता कम हो जाती है। इसे 'एक आकार सभी के लिए फिट' दृष्टिकोण कहा जाता है।
  2. राजकोषीय असंतुलन: राज्यों के पास व्यय की अधिक जिम्मेदारियां होती हैं, लेकिन राजस्व जुटाने के सीमित स्रोत होते हैं, जिससे वे केंद्र पर वित्तीय रूप से अत्यधिक निर्भर हो जाते हैं। यह राजकोषीय असंतुलन सहकारी संघवाद की भावना को कमजोर करता है।
  3. जवाबदेही का मुद्दा: जब केंद्र और राज्य दोनों एक ही योजना में योगदान करते हैं, तो अक्सर जवाबदेही का निर्धारण करना मुश्किल हो जाता है कि कौन सफलताओं या विफलताओं के लिए जिम्मेदार है।
  4. दोहरीकरण और अक्षमता: कभी-कभी केंद्र और राज्य दोनों एक ही क्षेत्र में अलग-अलग योजनाएं चलाते हैं, जिससे संसाधनों का दोहरीकरण और अक्षमता हो सकती है।
  5. राजनीतिक हस्तक्षेप: केंद्र सरकार वित्तीय हस्तांतरण को राजनीतिक लाभ के लिए एक उपकरण के रूप में उपयोग कर सकती है, जिससे केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव पैदा होता है।

निष्कर्षतः, केंद्र सरकार का राज्य और समवर्ती सूची के विषयों में योगदान राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने और क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने के लिए आवश्यक है। हालांकि, यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि यह राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता और स्थानीय आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशीलता को बनाए रखते हुए किया जाए, ताकि भारतीय संघवाद की सहकारी भावना मजबूत बनी रहे।