Public Administration Optional 2025 Paper II

भारत में लिंग समानता को बढ़ावा देने हेतु संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक अंतःक्षेप का वर्णन कीजिए। Highlight the constitutional provisions and judicial interventions to promote gender equality in India.

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भारत में लिंग समानता को बढ़ावा देने के लिए संविधान में कई प्रावधान किए गए हैं और न्यायपालिका ने भी अपने निर्णयों के माध्यम से इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

संवैधानिक प्रावधान:

  1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14): यह कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है, जो लिंग के आधार पर किसी भी भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।
  2. भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15): यह राज्य को धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव करने से रोकता है। अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है, जो सकारात्मक भेदभाव का आधार है।
  3. लोक नियोजन में अवसर की समानता (अनुच्छेद 16): यह सार्वजनिक रोजगार के मामलों में लिंग के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।
  4. राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP):
    • अनुच्छेद 39(a): पुरुषों और महिलाओं को समान रूप से आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार।
    • अनुच्छेद 39(d): पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन।
    • अनुच्छेद 42: काम की न्यायसंगत और मानवीय दशाओं तथा प्रसूति सहायता का प्रावधान।
  5. मूल कर्तव्य (अनुच्छेद 51A(e)): यह प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध हैं।
  6. स्थानीय स्वशासन में आरक्षण (अनुच्छेद 243D और 243T): पंचायती राज संस्थाओं और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों का आरक्षण, जिससे राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित होती है।

न्यायिक अंतःक्षेप: भारतीय न्यायपालिका ने संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या और विस्तार करके लिंग समानता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है:

  1. विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997): कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए 'विशाखा दिशानिर्देश' जारी किए, जो बाद में कानून का आधार बने।
  2. शाह बानो बेगम मामला (1985): मुस्लिम महिलाओं के तलाक के बाद गुजारा भत्ता के अधिकार को बरकरार रखा, हालांकि बाद में इसे कानून द्वारा पलट दिया गया।
  3. शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017): 'ट्रिपल तलाक' (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक घोषित किया, जिससे मुस्लिम महिलाओं को तत्काल तलाक के मनमाने अभ्यास से मुक्ति मिली।
  4. जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (2018): व्यभिचार (एडल्टरी) से संबंधित आईपीसी की धारा 497 को असंवैधानिक घोषित किया, इसे महिलाओं की गरिमा और समानता के विरुद्ध माना।
  5. समान कार्य के लिए समान वेतन: विभिन्न निर्णयों में अदालतों ने समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत को लागू किया है, भले ही यह DPSP में हो।
  6. संपत्ति के अधिकार: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन (2005) के बाद, अदालतों ने बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के समान अधिकार सुनिश्चित किए हैं।

ये संवैधानिक प्रावधान और न्यायिक हस्तक्षेप भारत में लिंग समानता की दिशा में एक मजबूत कानूनी और सामाजिक ढाँचा प्रदान करते हैं, हालांकि जमीनी स्तर पर अभी भी चुनौतियाँ मौजूद हैं।