Public Administration Optional 2025 Paper II

“स्वतंत्र भारत में औपनिवेशिक विरासत विभिन्न प्रशासनिक समस्याओं हेतु उत्तरदायी है क्योंकि कम्पनी अभिकर्ताओं और व्यापारियों ने दण्डनायकों, राज्यपालों और लोक सेवकों की भूमिका का रूप ले लिया।" विश्लेषण कीजिए । "The colonial legacy is responsible for many administrative problems in independent India as the role of company agents and traders evolved into Magistrates, Governors and Civil Servants." Analyze.

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स्वतंत्र भारत में कई प्रशासनिक समस्याएं औपनिवेशिक विरासत की देन हैं, जिसकी जड़ें ईस्ट इंडिया कंपनी के शुरुआती दिनों में हैं। कंपनी के अभिकर्ता और व्यापारी, जो मूल रूप से वाणिज्यिक हितों के लिए भारत आए थे, धीरे-धीरे प्रशासक, दण्डनायक (Magistrates), राज्यपाल और अंततः सिविल सेवक बन गए। इस क्रमिक परिवर्तन ने एक ऐसी प्रशासनिक संरचना और मानसिकता को जन्म दिया, जिसके नकारात्मक प्रभाव आज भी भारतीय प्रशासन में देखे जा सकते हैं।

प्रारंभ में, कंपनी का मुख्य उद्देश्य व्यापार और राजस्व संग्रह था। इसलिए, प्रशासन को इस तरह से संरचित किया गया था कि वह इन उद्देश्यों को पूरा कर सके। कलेक्टर, जो पहले राजस्व संग्रहकर्ता थे, को बाद में न्यायिक और कार्यकारी शक्तियां भी दी गईं, जिससे वे 'दण्डनायक' बन गए। यह शक्ति का केंद्रीकरण और 'माई-बाप' (पaternalistic) दृष्टिकोण, जहाँ अधिकारी स्वयं को जनता का संरक्षक मानते थे, औपनिवेशिक प्रशासन की पहचान बन गया।

इस विरासत के कारण स्वतंत्र भारत में उत्पन्न हुई प्रशासनिक समस्याएं निम्नलिखित हैं:

  1. अधिकारवादी और पदानुक्रमित संरचना: औपनिवेशिक प्रशासन का जोर नियंत्रण और आदेशों के पालन पर था, न कि सेवा और भागीदारी पर। यह कठोर पदानुक्रमित संरचना आज भी भारतीय नौकरशाही में व्याप्त है, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी और केंद्रीकृत रहती है।
  2. राजस्व-केंद्रित दृष्टिकोण: प्रशासन का प्राथमिक ध्यान राजस्व संग्रह पर था, जिससे कल्याणकारी कार्यों की उपेक्षा हुई। स्वतंत्र भारत में भी, कई बार विकास और कल्याणकारी योजनाओं की तुलना में नियमों और प्रक्रियाओं पर अधिक जोर दिया जाता है।
  3. जनता से दूरी: औपनिवेशिक सिविल सेवक स्वयं को शासक वर्ग का हिस्सा मानते थे और जनता से एक निश्चित दूरी बनाए रखते थे। यह अभिजात्यवादी मानसिकता आज भी कुछ हद तक बनी हुई है, जिससे प्रशासन और नागरिकों के बीच विश्वास की कमी रहती है।
  4. लालफीताशाही और प्रक्रियात्मक जटिलता: ब्रिटिश प्रशासन ने प्रक्रियाओं और नियमों पर अत्यधिक जोर दिया, जिससे लालफीताशाही का जन्म हुआ। यह जटिलता आज भी भ्रष्टाचार और अक्षमता का एक प्रमुख कारण है।
  5. पुलिस और न्याय प्रणाली का स्वरूप: पुलिस बल को मुख्य रूप से विद्रोहों को दबाने और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए बनाया गया था, न कि नागरिकों की सेवा के लिए। यह मानसिकता आज भी पुलिस-जनता संबंधों में तनाव का कारण बनती है। न्याय प्रणाली भी जटिल और धीमी बनी हुई है, जो औपनिवेशिक काल की देन है।
  6. भ्रष्टाचार: कंपनी के एजेंटों और व्यापारियों ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए पद का दुरुपयोग किया, जिससे भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हुईं। यह प्रवृत्ति स्वतंत्र भारत में भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

संक्षेप में, औपनिवेशिक विरासत ने भारतीय प्रशासन को एक ऐसी संरचना और संस्कृति दी, जो नियंत्रण, राजस्व और पदानुक्रम पर केंद्रित थी, न कि सेवा, कल्याण और भागीदारी पर। स्वतंत्र भारत ने इन संरचनाओं को अपनाया, लेकिन उनकी अंतर्निहित समस्याओं को पूरी तरह से दूर नहीं कर पाया, जिससे आज भी कई प्रशासनिक चुनौतियां बनी हुई हैं।